Sri Upadesamrita
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Sri Upadesamrita

·  Sri Upadesamritaश्रील रूप गोस्वामी के ग्यारह भक्ति-उपदेश हिंदी में

·  भक्ति की बाधाएँ, सहायक तत्त्व और वृंदावन-माहात्म्यसब एक ग्रंथ में

·  जेब में रखने योग्य आकारनित्य पाठ के लिए आदर्श

·  Soft Cover | हिंदी | ISBN: 9789382716914 | ₹40

·  मूल रचनाकार: श्रील रूप गोस्वामीषट् गोस्वामियों में अग्रणी

·  अनुवाद/भाष्य: Srila Prabhupada — परंपरा को जन-भाषा में जोड़ने वाले आचार्य

·  प्रकाशक: BBT — गुरु-परंपरा की हर कड़ी को जोड़े रखने वाला संस्थान

·  BBT मुद्रितशास्त्र-सम्मत, अपरिवर्तित, पीढ़ियों के लिए विश्वसनीय

·  ISKCON Mayapurरूप गोस्वामी की परंपरा की जीवंत भूमि का आधिकारिक स्टोर

·  mayapur.store — गौड़ीय परंपरा की जड़ों से, आपके हाथों तक

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भक्ति के मार्ग पर सबसे बड़ी कठिनाई यह नहीं है कि रास्ता लंबा हैकठिनाई यह है कि रास्ते में इंद्रियाँ बार-बार भटकाती हैं। मन कहीं और जाता है, जीभ कुछ और माँगती है, और जो साधना शुरू होती है वह कब धीमी पड़ जाती हैपता ही नहीं चलता। इसीलिए श्रील रूप गोस्वामी ने Sri Upadesamrita लिखीताकि हर साधक के पास एक ऐसा मार्गदर्शक हो जो कभी गलत कहे और कभी थके न।

Sri Upadesamrita अर्थात् "उपदेशों का अमृत" — यह महज एक छोटी पुस्तक नहीं है, यह ग्यारह श्लोकों में भक्ति-जीवन का पूरा व्याकरण है। श्रील रूप गोस्वामीजो स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यंत प्रिय शिष्य थेने इन ग्यारह सूत्रों में यह बता दिया कि भक्त को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, किससे संग करना चाहिए और किससे दूरी रखनी चाहिए।

पहले कुछ श्लोकों में वे वाणी, मन, क्रोध, उदर और जिह्वाइन पाँच चीजों को वश में करने की बात करते हैं। यह सुनने में सरल लगता है, लेकिन जो साधक इन्हें जीवन में उतारने की कोशिश करता है, उसे पता चलता है कि यही पाँच चीजें भक्ति की सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। आगे के श्लोकों में Sri Upadesamrita यह भी बताती है कि किन छह चीजों को अपनाने से और किन छह से बचने से भक्ति तेजी से बढ़ती है।

इस पुस्तक की एक और विशेषता हैइसके अंतिम श्लोकों में वृंदावन और राधाकुंड का ऐसा वर्णन है कि पाठक का मन अपने आप उस दिव्य भूमि की ओर खिंचने लगता है। श्रील रूप गोस्वामी ने वहाँ की रज को इतने प्रेम से याद किया है कि पढ़ते हुए एक अजीब सी तड़प जागती हैवह तड़प जो हर सच्चे भक्त के जीवन का हिस्सा है।

श्रील प्रभुपाद ने Sri Upadesamrita का हिंदी अनुवाद और भाष्य इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ तो स्पष्ट होता ही है, साथ ही उसकी व्यावहारिक उपयोगिता भी समझ में आती है। उनका भाष्य पढ़ते हुए लगता है जैसे वे किसी शिष्य को सीधे संबोधित कर रहे हों अधिक शास्त्रीय, अधिक सरलबिल्कुल सटीक।

यह पुस्तक आकार में छोटी हैजेब में रखी जा सकती हैलेकिन इसका प्रभाव जीवनभर का है। जो साधक इसे एक बार ध्यान से पढ़ लेता है, वह बार-बार इसकी तरफ लौटता है। हर बार पढ़ने पर कोई कोई नई बात मिलती हैक्योंकि Sri Upadesamrita का हर श्लोक अनुभव के साथ गहरा होता जाता है।

मूल रचनाकार: श्रील रूप

9789382716914
Author
Krishnakripamurti Srila abhaycharanarabinda bhaktivedanta Swami
Length
4.9
Width
0.2
Height
7.1
Binding
Soft Cover
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